Daughter rights in Property: पैतृक संपत्ति पर नया कानून बेटियों का भी हक

भारत में संपत्ति का बँटवारा हमेशा से ही एक संवेदनशील विषय रहा है। लंबे समय तक पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) पर केवल बेटों का ही अधिकार माना जाता रहा, लेकिन कानून ने अब सदियों पुरानी Daughter rights in Property of father प्रथा को बदल दिया है। 11 अगस्त 2020 को ‘विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले ने हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 को अंतिम रूप दिया, जिसने बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के बिल्कुल बराबर का दर्जा दिया है।

Daughter rights in Property of mother आर्टिकल सिर्फ कानूनी जानकारी नहीं है, बल्कि यह सम्मान, समानता और न्याय की नई सामाजिक नींव है।

Daughter rights in Property पैतृक संपत्ति पर बेटियों का हक

इस नियम को विस्तार में समझाते है

1. पिता की संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार: बेटी अब ‘सहदायिक’

कानूनी भाषा में, पैतृक संपत्ति पर जन्म से अधिकार रखने वाले व्यक्ति को ‘सहदायिक’ (Coparcener) कहा जाता है।

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  • पुराना नियम: केवल बेटे, पोते और पर-पोते ही सहदायिक माने जाते थे।
  • नया कानून: अब बेटी भी जन्म से सहदायिक है। इसका मतलब है कि पैतृक संपत्ति में बेटी का अधिकार उतना ही मजबूत है जितना कि एक बेटे का होता है।
  • विवाह का असर नहीं: एक बेटी के विवाहित होने या न होने से उसके इस अधिकार पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। कानून की नज़र में, ‘एक बार बेटी, हमेशा बेटी’ है।

2. क्या पिता का जीवित होना ज़रूरी है?

यह सबसे बड़ा भ्रम था जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।

 * कि पैतृक संपत्ति पर बेटी के अधिकार के लिए यह बिल्कुल ज़रूरी नहीं है कि उसके पिता 9 सितंबर 2005 (संशोधन लागू होने की तारीख) को जीवित हों।

* स्पष्टीकरण: बेटी का अधिकार पिता की उपस्थिति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि वह उसके जन्म से ही उसे प्राप्त होता है। भले ही पिता की मृत्यु 2005 से पहले हो गई हो, बेटी संपत्ति में

3.  कानून का पिछलाप्रभाव (Retrospective Effect)

यह कानून केवल भविष्य पर ही नहीं, बल्कि अतीत की संपत्तियों पर भी लागू होता है:

  • कानून के अनुसार, यह अधिकार 9 सितंबर 2005 से लागू माना जाएगा।
  • अगर किसी बेटी का जन्म 2005 से पहले हुआ है, तब भी वह बराबर की हिस्सेदार है।
  • अपवाद: यह नियम केवल उन्हीं संपत्तियों पर लागू होगा जिनका कानूनी बँटवारा (Partition) 20 दिसंबर 2004 से पहले नहीं हुआ था।

4. सामाजिक संदेश: सम्मान और बराबरी

यह कानून केवल संपत्ति का बँटवारा नहीं है, बल्कि समाज को एक गहरा संदेश है:

* समानता की शुरुआत: यह कानून लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह साफ करता है कि बेटी भी परिवार की उतनी ही मूल्यवान सदस्य है जितना कि बेटा।

 * महिलाओं का सशक्तिकरण: यह अधिकार महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है। संपत्ति में हिस्सा होने से वे सामाजिक और आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र और सशक्त बनेंगी।

 * भाईचारे का महत्व: कानूनी अधिकारों की जानकारी के साथ ही, यह आवश्यक है कि परिवार आपसी समझ और प्रेम से संपत्ति का बँटवारा करें। कानूनी लड़ाई रिश्तों को तोड़ देती है, जबकि संवाद (Dialogue) न्याय सुनिश्चित करता है।

कब नहीं मिलेगा बेटियों को पिता की संपत्ति में हक

कुछ परिस्थितियों में बेटियों को पिता की संपत्ति में हक़ नहीं मिल सकता हैं। जब पिता अपनी मृत्यु से पहले अपनी संपत्ति का क़ानूनी रूप से वितरण कर चुके होते हैं। यदि पिता ने अपनी स्व-अर्जित संपत्ति (self-acquired property) को किसी विशेष उत्तराधिकारी को दे दिया है, तो बेटी उस पर दावा नहीं कर सकती।

लेकिन यह स्थिति केवल स्व-अर्जित संपत्ति पर लागू होती है। अगर संपत्ति पैतृक (ancestral) है, यानी पिता को उनके पूर्वजों से मिली है, तो पिता इसे किसी एक उत्तराधिकारी को नहीं दे सकते। ऐसी स्थिति में बेटी और बेटे दोनों को समान अधिकार मिलता है।

निष्कर्ष: अपनी जड़ों को मजबूत करें

बेटियों को उनका कानूनी और नैतिक हक़ मिलना, समाज के लिए एक स्वस्थ संकेत है। मेरा भी मत है कि बेटियों को उनका हक़ मिलना चाहिए इसलिए कानून का सम्मान करना और सही जानकारी रखना ही एक न्यायसंगत और मजबूत परिवार की नींव है। यदि संपत्ति पिता ने खुद कमाई है, तो वे अपनी वसीयत के अनुसार उसे किसी भी वारिस को दे सकते हैं। ऐसे में बेटी उस पर दावा नहीं कर सकती है।

याद रखें: संपत्ति तो बँट जाएगी, लेकिन परिवार का प्यार, सम्मान और भाईचारा हमेशा एक रहे, यह हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।