Gautam Buddha Biography: ‘एशिया के ज्योतिपुंज’ महात्मा बुद्ध का संपूर्ण जीवन वृत्तांत

Gautam Buddha Biography: महात्मा बुद्ध, जिन्हें ‘एशिया का ज्योतिपुंज‘ (Light of Asia) कहा जाता है, न केवल एक धर्म के प्रवर्तक थे, बल्कि वे मानव इतिहास के सबसे महान मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक और शांतिदूत थे। उनका जीवन सुख और त्याग, मोह और मोक्ष, तथा अज्ञान और प्रकाश के बीच के संघर्ष की एक अमर गाथा है।

Main Points of Content

Gautam Buddha Biography: गौतम बुद्ध का जीवन परिचय (भाग-1)

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और जन्म का दिव्य संदर्भ

ईसा पूर्व छठी शताब्दी भारत के इतिहास में एक वैचारिक क्रांति का समय था। उस समय उत्तर भारत के हिमालय की तराई में शाक्य वंश का शासन था, जिसकी राजधानी कपिलवस्तु थी। यहाँ के राजा शुद्धोधन एक न्यायप्रिय और शक्तिशाली शासक थे। उनकी रानी महामाया अत्यंत धार्मिक और रूपवती थीं।

रानी महामाया का स्वप्न

बुद्ध के जन्म से जुड़ी कथाओं में उल्लेख है कि रानी महामाया ने एक रात स्वप्न देखा कि एक श्वेत हाथी, जिसके हाथ में कमल का फूल था, उनके गर्भ में प्रवेश कर रहा है। ज्योतिषियों ने इस स्वप्न का अर्थ निकाला कि उनके यहाँ एक ऐसा पुत्र जन्म लेगा, जो या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर संसार को सत्य की राह दिखाने वाला एक महान बुद्ध (ज्ञानी) होगा।

लुम्बिनी में जन्म

सिद्धार्थ गौतम का जन्म शाक्य गणराज्य की राजधानी “कपिलवस्तु” (आधुनिक नेपाल-भारत सीमा) के पास “लुंबिनी” वन में हुआ। पिता: राजा “शुद्धोधन” क्षत्रिय, शाक्य कुल के थे और माता: रानी “महामाया” कोलीय वंश की थी।

रानी महामाया अपने मायके (देवदह) जा रही थीं। रास्ते में लुम्बिनी नामक वन में, वैशाख पूर्णिमा के दिन, एक विशाल साल वृक्ष के नीचे उन्होंने बालक को जन्म दिया। बालक के जन्म के सात दिन बाद ही रानी महामाया का देहांत हो गया। बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया, जिसका अर्थ है—’वह जिसने अपना लक्ष्य सिद्ध कर लिया हो’। Philosophy Thoughts about Mahatma Buddh

2. बचपन, पालन-पोषण और अद्भुत लक्षण

सिद्धार्थ की माता के निधन के बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी और विमाता महाप्रजापति गौतमी ने किया। सिद्धार्थ साधारण बालकों जैसे नहीं थे।

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महापुरुष के 32 लक्षण

शास्त्रों के अनुसार, सिद्धार्थ के शरीर पर महापुरुष के 32 लक्षण विद्यमान थे। जब ऋषि असित ने बालक को देखा, तो वे पहले मुस्कुराए और फिर रोने लगे। राजा के पूछने पर उन्होंने कहा, “राजन्! मैं इसलिए मुस्कुराया क्योंकि यह बालक साक्षात ज्ञान का अवतार है, और इसलिए रोया क्योंकि जब तक यह बालक सत्य का मार्ग दिखाएगा, तब तक मैं जीवित नहीं रहूँगा।”

महल का स्वर्ण पिंजरा

राजा शुद्धोधन ऋषि की भविष्यवाणी से भयभीत थे। वे नहीं चाहते थे कि उनका इकलौता पुत्र संन्यासी बने। इसलिए उन्होंने सिद्धार्थ के लिए तीन विशेष महल बनवाए—’रम्य’, ‘सुरम्य’ और ‘शुभ’। इन महलों में दुख, वृद्धावस्था या मृत्यु का नामोल्शान तक नहीं था। यहाँ केवल युवा दास-दासियाँ, संगीत और नृत्य का वातावरण रहता था ताकि सिद्धार्थ का मन कभी बाहरी दुनिया के कष्टों की ओर न जाए।

3. विवाह और सांसारिक बंधन

सिद्धार्थ का मन बचपन से ही एकांतप्रिय और विचारशील था। वे अक्सर जामुन के पेड़ के नीचे बैठकर गहरे ध्यान में खो जाया करते थे। राजा शुद्धोधन ने सोचा कि यदि सिद्धार्थ का विवाह कर दिया जाए, तो वह गृहस्थ जीवन में बंध जाएगा।

  • विवाह: 16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह अत्यंत सुंदर राजकुमारी यशोधरा से हुआ। यशोधरा सिद्धार्थ के प्रति पूर्णतः समर्पित थीं।
  • पुत्र राहुल का जन्म: विवाह के कई वर्षों बाद उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जब सिद्धार्थ को पुत्र जन्म का समाचार मिला, तो उनके मुख से निकला—राहुल (जिसका अर्थ है—बंधन या राहु के समान बाधा)। उन्हें लगा कि अब वे संसार के बंधनों में और अधिक जकड़ते जा रहे हैं।

4. वैराग्य का उदय: जीवन के चार निर्णायक दृश्य

राजा के तमाम प्रयासों के बावजूद नियति ने अपना मार्ग चुन लिया था। एक दिन सिद्धार्थ ने अपने सारथी छंदक (चन्ना) से नगर भ्रमण की इच्छा जताई। इस यात्रा के दौरान उन्होंने चार ऐसे दृश्य देखे जिन्होंने उनके जीवन की दिशा सदैव के लिए बदल दी:

  1. वृद्ध व्यक्ति: उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति की कमर झुकी हुई है, बाल सफेद हैं और वह कांपते हुए चल रहा है। सिद्धार्थ ने पूछा, “चन्ना! यह कौन है?” चन्ना ने उत्तर दिया, “राजकुमार, यह वृद्धावस्था है, जो हर जीवित प्राणी को एक दिन स्वीकार करनी होगी।”
  2. रोगी व्यक्ति: आगे बढ़ने पर उन्होंने एक कराहते हुए बीमार व्यक्ति को देखा। चन्ना ने बताया कि शरीर रोगों का घर है और कोई भी व्यक्ति इससे अछूता नहीं है।
  3. मृत देह (शव): सिद्धार्थ ने देखा कि चार लोग एक शव को ले जा रहे हैं और पीछे लोग विलाप कर रहे हैं। चन्ना ने कहा, “प्रभु, यह मृत्यु है। अंत में सबको इसी मिट्टी में मिल जाना है।”
  4. शांत संन्यासी: अंत में सिद्धार्थ ने एक प्रसन्न और शांत संन्यासी को देखा। चन्ना ने बताया कि इस व्यक्ति ने संसार के दुख और सुख को त्याग दिया है और शांति की खोज में लगा है।

इन चार दृश्यों ने सिद्धार्थ के भीतर वैराग्य की अग्नि प्रज्वलित कर दी। उन्होंने सोचा, यदि बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु अटल है, तो इन क्षणिक सुखों का क्या मूल्य?”

5. महाभिनिष्क्रमण: आधी रात का त्याग

29 वर्ष की आयु में, सिद्धार्थ ने उस सत्य की खोज का संकल्प लिया जिसे ‘निर्वाण’ कहा जाता है। वह रात पूर्णिमा की थी। सिद्धार्थ ने अपनी सोती हुई पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को देखा। वे उन्हें जगाना चाहते थे, लेकिन उन्हें लगा कि मोह फिर से उनके कदम रोक लेगा।

बिना किसी को बताए, वे अपने घोड़े कंतक पर सवार हुए और सारथी चन्ना के साथ महल से निकल गए। नगर की सीमा पार करने के बाद उन्होंने:

  • अपने राजसी वस्त्र उतार दिए।
  • तलवार से अपने केश काट डाले।
  • अपने गहने चन्ना को सौंप दिए और उसे वापस कपिलवस्तु भेज दिया।

इतिहास में इस महान त्याग को महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। एक राजकुमार अब एक भिक्षु बन चुका था, जिसके पास न घर था, न परिवार, और न ही कोई संपत्ति।

महात्मा बुद्ध: सत्य की खोज और बुद्धत्व की प्राप्ति (भाग-2)

राजसी सुखों का त्याग करने के बाद सिद्धार्थ गौतम के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि सत्य क्या है और दुखों से मुक्ति कैसे संभव है?” वे एक ऐसे मार्ग की तलाश में थे जो तर्कसंगत हो और मानव जाति के काम आए।

6. गुरुओं की खोज और दार्शनिक ज्ञान

कपिलवस्तु की सीमा पार करने के बाद सिद्धार्थ सबसे पहले वैशाली पहुँचे। यहाँ उनकी भेंट उस समय के प्रसिद्ध विद्वान आलार कलाम से हुई।

  • आलार कलाम के साथ साधना: सिद्धार्थ उनके शिष्य बने और ध्यान की उच्च अवस्थाएँ सीखीं। उन्होंने ‘शून्यता’ (Nothingness) के दर्शन को समझा, लेकिन उन्हें लगा कि यह अंतिम सत्य नहीं है। उनके मन की जिज्ञासा शांत नहीं हुई।
  • उद्दक रामपुत्त: इसके बाद वे राजगृह गए और ऋषि उद्दक रामपुत्त से शिक्षा ली। यहाँ उन्होंने योग की और भी गहरी अवस्थाएँ सीखीं, लेकिन यहाँ भी उन्हें वह उत्तर नहीं मिला जो वे खोज रहे थे। उन्हें अहसास हुआ कि केवल ज्ञान और योग की क्रियाएँ दुखों के मूल कारण को नष्ट नहीं कर सकतीं।

7. उरुवेला का कठिन तप (Extreme Asceticism)

गुरुओं से संतुष्ट न होने के बाद सिद्धार्थ ने स्वयं के प्रयास से सत्य को खोजने का निर्णय लिया। वे गया (बिहार) के पास उरुवेला के जंगलों में पहुँचे। यहाँ उनके साथ पाँच अन्य ब्राह्मण साधक भी थे—कौण्डिन्य, भदिय, वप्प, महानम और अस्सजि।

काया-क्लेश का मार्ग

सिद्धार्थ ने सोचा कि शायद शरीर को अत्यधिक कष्ट देने से आत्मा को शांति मिलेगी। उन्होंने अत्यंत कठोर तपस्या शुरू की:

  1. अल्पाहार: उन्होंने धीरे-धीरे भोजन करना बंद कर दिया। वे केवल एक फल या मुट्ठी भर अन्न पर जीवित रहने लगे।
  2. शारीरिक स्थिति: उनका शरीर कंकाल बन गया। उनकी आँखों के गड्ढे गहरे हो गए और उनकी त्वचा किसी सूखे पेड़ की छाल जैसी दिखने लगी। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, जब वे अपने पेट को छूते थे, तो उन्हें अपनी रीढ़ की हड्डी महसूस होती थी।
  3. चेतना का संकट: एक दिन तपस्या के दौरान वे इतने कमजोर हो गए कि बेहोश होकर गिर पड़े। उन्हें समझ आया कि यदि शरीर ही नहीं रहेगा, तो ज्ञान की प्राप्ति कैसे होगी?

वीणा का उदाहरण और मध्यम मार्ग

कहा जाता है कि उस समय उन्होंने कुछ लोक गायिकाओं को गाते हुए सुना: वीणा के तारों को इतना मत कसो कि वे टूट जाएँ, और इतना ढीला भी मत छोड़ो कि उनसे स्वर ही न निकले।”

इस बात ने सिद्धार्थ की आँखें खोल दीं। उन्होंने महसूस किया कि सत्य की खोज के लिए न तो विलासिता (राजसी जीवन) सही है और न ही अत्यधिक कष्ट (कठोर तप)। उन्होंने मध्यम मार्ग‘ (The Middle Path) को अपनाने का निश्चय किया।

8. सुजाता की खीर और साथियों का त्याग

सिद्धार्थ ने अपनी तपस्या भंग की और पास के गाँव की एक महिला सुजाता के हाथों से एक कटोरा खीर ग्रहण की। सुजाता ने मन्नत माँगी थी कि यदि उसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तो वह वृक्ष देवता को खीर चढ़ाएगी। उसने सिद्धार्थ को ही देवता समझकर वह खीर भेंट की।

जैसे ही सिद्धार्थ ने भोजन किया, उनके शरीर में ऊर्जा का संचार हुआ। लेकिन उनके पाँचों ब्राह्मण साथी यह देखकर क्रोधित हो गए। उन्हें लगा कि सिद्धार्थ अपने मार्ग से भटक गए हैं और ‘भ्रष्ट’ हो गए हैं। वे उन्हें छोड़कर सारनाथ चले गए। अब सिद्धार्थ बिल्कुल अकेले थे।

9. बोधि वृक्ष के नीचे अंतिम संकल्प

सिद्धार्थ अब पूरी तरह से संकल्पित थे। वे निरंजना नदी के तट पर एक विशाल पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उन्होंने प्रतिज्ञा की:

इहासने शुष्यतु मे शरीरं, त्वगस्थिमांसं प्रलयं च यातु। अप्राप्य बोधिं बहुकल्पदुर्लभां, नैवास्तनात्कायमतश्चलिष्यते।”

(अर्थात: चाहे मेरा शरीर सूख जाए, त्वचा और हड्डियाँ गल जाएँ, लेकिन जब तक मुझे वह परम ज्ञान प्राप्त नहीं होगा जो कल्पों में भी दुर्लभ है, मैं इस आसन से नहीं उठूँगा।)

10. मार (कामदेव) पर विजय: मनोवैज्ञानिक युद्ध

जब सिद्धार्थ समाधि में लीन थे, तो उनके मन में कई विक्षेप उत्पन्न हुए। बौद्ध दर्शन में इसे मार‘ (Mara) का आक्रमण कहा गया है। मार अज्ञान और वासना का प्रतीक है।

  • मार ने पहले अपनी सुंदर पुत्रियों को भेजकर सिद्धार्थ को विचलित करने की कोशिश की।
  • फिर उसने भयंकर राक्षसों और प्राकृतिक आपदाओं (आंधी-तूफान) का डर दिखाया।
  • अंत में मार ने सिद्धार्थ के अधिकार पर सवाल उठाया कि वह बुद्ध बनने के योग्य क्यों हैं?

सिद्धार्थ ने अपना दायाँ हाथ धरती की ओर किया (भूमिस्पर्श मुद्रा) और कहा, यह पृथ्वी मेरे तप और त्याग की साक्षी है।” मार पराजित हुआ और सिद्धार्थ का मन पूरी तरह शांत और निर्मल हो गया।

11. बुद्धत्व की प्राप्ति: प्रकाश का उदय

वैशाख पूर्णिमा की वह रात मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण रातों में से एक थी। ध्यान की विभिन्न अवस्थाओं को पार करते हुए:

  • प्रथम प्रहर: उन्हें अपने पिछले जन्मों का ज्ञान हुआ।
  • द्वितीय प्रहर: उन्हें ब्रह्मांड के कार्यों और मृत्यु-पुनर्जन्म के चक्र का ज्ञान हुआ।
  • तृतीय प्रहर: उन्हें ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ (कारण-कार्य का सिद्धांत) और ‘चार आर्य सत्यों’ का बोध हुआ।

सुबह का तारा उदय होते ही 35 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ‘बुद्ध’ हो गए। उन्हें वह परम ज्ञान (निर्वाण) प्राप्त हुआ, जिसकी खोज में वे वर्षों से भटक रहे थे। अब वे अज्ञान के अंधकार से मुक्त होकर तथागत (जैसा है वैसा ही जानने वाले) बन चुके थे।

महात्मा बुद्ध: धम्म का चक्र और महान शिक्षाएँ (भाग-3)

यह महात्मा बुद्ध के जीवन वृत्तांत कातृतीय खंडहै। ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध का जीवन ‘स्वयं के कल्याण’ से बदलकर ‘जगत के कल्याण’ की ओर मुड़ गया। यहाँ हम उनके सबसे महत्वपूर्ण दर्शन—चार आर्य सत्य, अष्टांगिक मार्ग और उनके उन उपदेशों का विस्तार से वर्णन करेंगे जिन्होंने दुनिया की सोच बदल दी।

बोधगया में बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद, भगवान बुद्ध के मन में पहला विचार यह आया कि “क्या यह गूढ़ ज्ञान साधारण मनुष्य समझ पाएंगे?” लेकिन करुणा के वशीभूत होकर उन्होंने इस सत्य को संसार के साथ साझा करने का निर्णय लिया। वे बोधगया से पैदल चलकर वाराणसी के निकट सारनाथ (ऋषिपत्तन) पहुँचे। यहाँ उन्होंने अपने उन पाँच पुराने साथियों को पहला उपदेश दिया, जो उन्हें छोड़कर चले गए थे।

12. चार आर्य सत्य (The Four Noble Truths)

बुद्ध का संपूर्ण दर्शन इन चार सत्यों पर टिका है। उन्होंने जीवन को एक ‘मनोवैज्ञानिक’ और ‘चिकित्सक’ की दृष्टि से देखा—पहले रोग की पहचान की, फिर उसका कारण ढूँढा, फिर निवारण की संभावना देखी और अंत में औषधि (दवा) बताई।

क्रमआर्य सत्यव्याख्या
1दुख (Dukkha)संसार में दुख व्याप्त है। जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, प्रिय का बिछड़ना और अप्रिय का मिलना—सब दुख है।
2दुख समुदाय (Samudaya)दुख का एक निश्चित कारण है। वह कारण है—’तृष्णा’ (लालसा या इच्छा)।
3दुख निरोध (Nirodha)दुख का अंत संभव है। यदि तृष्णा या इच्छाओं का त्याग कर दिया जाए, तो दुख समाप्त हो जाएगा।
4दुख निरोध गामिनी प्रतिपदा (Magga)दुख दूर करने का एक निश्चित मार्ग है, जिसे ‘अष्टांगिक मार्ग’ कहा जाता है।

13 . अष्टांगिक मार्ग (The Eightfold Path)

बुद्ध ने मोक्ष के लिए न तो शरीर को अत्यधिक कष्ट देने को कहा और न ही भोग-विलास में डूबे रहने को। उन्होंने मध्यम मार्ग (The Middle Way) की वकालत की। अष्टांगिक मार्ग को तीन मुख्य श्रेणियों में बाँटा जा सकता है: प्रज्ञा (ज्ञान), शील (नैतिकता) और समाधि (एकाग्रता)।

क. प्रज्ञा (Wisdom)

  1. सम्यक दृष्टि (Right View): सत्य और असत्य, उचित और अनुचित के बीच अंतर करना। चार आर्य सत्यों को समझना।
  2. सम्यक संकल्प (Right Resolve): मानसिक और नैतिक विकास का दृढ़ निश्चय करना। हिंसा और द्वेष को त्यागने का संकल्प।

ख. शील (Ethical Conduct)

  • सम्यक वाक् (Right Speech): सदैव सत्य और प्रिय बोलना। झूठ बोलना, कठोर शब्द कहना या चुगली करना त्यागना।
  • सम्यक कर्मांत (Right Action): पवित्र कर्म करना। अहिंसा का पालन करना, चोरी न करना और इंद्रियों पर संयम रखना।
  • सम्यक आजीव (Right Livelihood): ईमानदारी से अपनी जीविका कमाना। ऐसे व्यापार से बचना जिससे दूसरों को हानि पहुँचे (जैसे शस्त्र या मांस का व्यापार)।

ग. समाधि (Mental Discipline)

  • सम्यक व्यायाम (Right Effort): अपने मन के भीतर बुरे विचारों को आने से रोकना और अच्छे विचारों को जगाए रखना।
  • सम्यक स्मृति (Right Mindfulness): सजग रहना। अपनी शारीरिक क्रियाओं, संवेदनाओं और विचारों के प्रति हर क्षण सचेत रहना।
  • सम्यक समाधि (Right Concentration): मन की एकाग्रता। ध्यान के माध्यम से मन को शांत और स्थिर करना।

14. महात्मा बुद्ध के प्रमुख उपदेश और दर्शन

बुद्ध की शिक्षाएँ केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं थीं, बल्कि वे जीवन जीने की एक पद्धति थीं। उनके कुछ प्रमुख उपदेश निम्नलिखित हैं:

अहिंसा और करुणा

बुद्ध का सबसे बड़ा उपदेश ‘अहिंसा’ था। उन्होंने कहा कि “घृणा से घृणा कभी शांत नहीं होती, बल्कि घृणा को केवल प्रेम से ही शांत किया जा सकता है।” उन्होंने मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों के प्रति भी करुणा रखने की सीख दी।

अनित्यवाद (Anicca – Impermanence)

बुद्ध ने सिखाया कि संसार की हर वस्तु परिवर्तनशील है। कुछ भी स्थायी नहीं है—न हमारा शरीर, न दुख और न ही सुख। जब मनुष्य यह समझ लेता है कि सब कुछ क्षणिक है, तो उसका चीजों के प्रति मोह (Attachment) कम हो जाता है, जो शांति का आधार है।

अनात्मवाद (Anatta – Non-Self)

बुद्ध ने ‘आत्मा’ की उस स्थायी अवधारणा को नकार दिया जो उस समय प्रचलित थी। उन्होंने कहा कि जिसे हम ‘मैं’ कहते हैं, वह केवल पाँच स्कंधों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान) का एक समूह है।

सामाजिक समानता और जाति प्रथा का विरोध

बुद्ध ने तत्कालीन समाज में व्याप्त जाति-पाति के भेद का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने कहा:

“मनुष्य जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से ब्राह्मण या शूद्र होता है।”

उनके संघ में राजा से लेकर सफाई करने वाले और डाकुओं से लेकर व्यापारियों तक—सबको समान स्थान प्राप्त था।

अप्प दीपो भव (Be your own light)

बुद्ध ने अंधविश्वास और लकीर का फकीर बनने का विरोध किया। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “मेरी बातों को इसलिए मत मानो क्योंकि मैं तुम्हारा गुरु हूँ, बल्कि उन्हें अपने विवेक की कसौटी पर परखो।” उन्होंने हर व्यक्ति को अपना दीपक स्वयं बनने (आत्म-निर्भरता) की प्रेरणा दी।

15. धम्म का विस्तार: प्रमुख घटनाएं

बुद्ध ने अगले 45 वर्षों तक पूरे उत्तर भारत (मगध, कोशल, वैशाली) का भ्रमण किया।

  • अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन: श्रावस्ती के जंगलों में बुद्ध ने खूंखार डाकू अंगुलिमाल का सामना किया। बुद्ध की शांति और निडरता देखकर अंगुलिमाल का हृदय बदल गया और वह उनका शिष्य बन गया।
  • आनंद और महिलाओं का प्रवेश: बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद के विशेष आग्रह पर, बुद्ध ने महिलाओं को संघ में प्रवेश की अनुमति दी। उनकी माता महाप्रजापति गौतमी संघ में शामिल होने वाली पहली महिला थीं।
  • राजाओं का समर्पण: मगध नरेश बिंबिसार, अजातशत्रु और कोशल नरेश प्रसेनजित जैसे शक्तिशाली राजाओं ने बुद्ध का शिष्यत्व स्वीकार किया और बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायता की।

महात्मा बुद्ध: अंतिम यात्रा और शाश्वत विरासत (भाग-4)

45 वर्षों तक निरंतर सत्य का प्रचार करने के बाद, भगवान बुद्ध अब 80 वर्ष के हो चुके थे। उनका शरीर जर्जर हो गया था, लेकिन उनकी आत्मिक शक्ति और करुणा पहले जैसी ही प्रखर थी। वे जानते थे कि अब उनके इस भौतिक शरीर के त्याग का समय निकट आ गया है।

16. महापरिनिर्वाण: निर्वाण की पूर्णता

बुद्ध की अंतिम यात्रा वैशाली से शुरू होकर कुशीनगर तक गई। इस यात्रा के दौरान उन्होंने अपने प्रिय शिष्य आनंद को कई महत्वपूर्ण शिक्षाएँ दीं।

अंतिम भोजन और अस्वस्थता

मार्ग में बुद्ध ‘पावा’ नामक स्थान पर पहुँचे। यहाँ चुन्द नामक एक लोहार ने बुद्ध को भोजन (सूकर-मद्दव) अर्पित किया। इस भोजन को ग्रहण करने के बाद बुद्ध को रक्त-अतिसार (Dysentery) की गंभीर बीमारी हो गई और उन्हें असहनीय पीड़ा होने लगी। इसके बावजूद, बुद्ध ने चुन्द को सांत्वना दी कि उसका भोजन दोषपूर्ण नहीं था, बल्कि वह भोजन उन्हें पूर्ण मोक्ष (परिनिर्वाण) की ओर ले जाने वाला अंतिम पुण्य है।

कुशीनगर का शाल वन

अत्यंत रुग्ण अवस्था में बुद्ध कुशीनगर पहुँचे। वहाँ हिरण्यवती नदी के तट पर, दो विशाल ‘शाल’ वृक्षों के बीच उनका बिस्तर लगाया गया। बुद्ध ने उत्तर की ओर सिर करके करवट ली और लेट गए।

अंतिम शिष्य: सुभद्द

मृत्यु के ठीक पहले, ‘सुभद्द’ नामक एक जिज्ञासु व्यक्ति बुद्ध के पास आया। आनंद ने उसे रोकने की कोशिश की क्योंकि बुद्ध बहुत कमजोर थे, लेकिन बुद्ध ने उसे पास बुलाया और अपनी अंतिम शिक्षा दी। सुभद्द बुद्ध का अंतिम दीक्षित शिष्य बना।

17. अंतिम शब्द: ‘अप्प दीपो भव’

जब उनके शिष्यों ने बुद्ध के जाने के विचार से विलाप करना शुरू किया, तो बुद्ध ने उन्हें धीरज बंधाया। उन्होंने कहा:

“हे भिक्षुओं! शोक मत करो। क्या मैंने तुम्हें पहले नहीं बताया कि सभी प्रिय वस्तुओं से विछोह निश्चित है? जो भी उत्पन्न हुआ है, उसका विनाश अनिवार्य है।”

बुद्ध के अंतिम शब्द (Last Words) थे:

वयधम्मा संखार अप्पमादेन संपादेथ।”

(अर्थात: सभी संस्कार और वस्तुएँ नाशवान हैं; अप्रमाद के साथ, यानी सजग रहकर अपना उद्धार करो।)

वैशाख पूर्णिमा के दिन, 483 ईसा पूर्व (कुछ स्रोतों के अनुसार 480 ई.पू.) में बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। उनका शरीर शांत हो गया, लेकिन उनका ‘धम्म’ (धर्म) अमर हो गया।

18. बुद्ध के बाद: बौद्ध धर्म का वैश्विक विस्तार

बुद्ध की मृत्यु के बाद, उनके अवशेषों को आठ भागों में विभाजित किया गया और उन पर स्तूपों का निर्माण कराया गया। उनके विचारों को संरक्षित करने के लिए समय-समय पर बौद्ध संगीतियाँ‘ (Councils) आयोजित की गईं:

  1. प्रथम संगीति (राजगृह): बुद्ध की मृत्यु के तुरंत बाद, जहाँ बुद्ध के वचनों को ‘सुत्त पिटक’ और ‘विनय पिटक’ के रूप में संकलित किया गया।
  2. सम्राट अशोक का योगदान: ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में महान सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म स्वीकार किया। उन्होंने अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा और धम्म महामात्रों की नियुक्ति की। अशोक के प्रयासों से बुद्ध का विचार एक स्थानीय संप्रदाय से बदलकर एक विश्व धर्म बन गया।
  3. चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया: कनिष्क और हर्ष जैसे राजाओं के काल में बौद्ध धर्म सिल्क रोड के माध्यम से चीन, कोरिया और जापान तक पहुँचा। दक्षिण में यह म्यांमार, थाईलैंड और वियतनाम की संस्कृति का हिस्सा बन गया।

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